12 November

बराबरी नहीं बेहतरी

not just Equality we want better then
By भागवत तावरे
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बराबरी नहीं बेहतरी पर हो ध्यान 
महिला सशक्तिकरण यह एक ऐसा विषय है जिसपर वर्तमान समय में शायद सबसे अधिक लिखा जाता रहा है। प्रत्येक व्यक्ति, लेखक अपने -अपने मत रखता आया है। महिलाएं स्वयं भी अपने अधिकारों से भलिभाँति परिचित हैं। वे स्वयं अपनी आवाज बन रहीं हैं। लेकिन हमारी सबसे बड़ी गलती यह है कि हम पुरूषों से बराबरी चाहते हैं। पर क्यों? मुझे नहीं लगता स्वयं को सशक्त साबित करने के लिए हमें पुरूषों से किसी भी प्रकार का मुकाबला करने की आवश्यकता है। विकास एक सतत होने वाली प्रक्रिया है जिसके लिए इंसान की खुद से प्रतिस्पर्धा आवश्यक है न कि किसी अन्य के साथ। स्वयं के सशक्तिकरण  के लिए हमें पुरुषों की शक्ति को चुनौती देने या उससे बराबरी करने की आवश्यकता नहीं है। अपने को समृद्ध बनाने के लिए अपनी लकीर को बड़ा कीजिए न कि सामने वाले की लकीर को छोटा। 
महिलाएं प्रारंभ से ही अपनी संकुचित मानसिकता का शिकार रही हैं। वे स्वयं को कमजोर व पुरूष के अधीन समझती आईं हैं। उन्हें स्वयं पर इतना भी यकीन नहीं कि वे अकेले घर चला सकती हैं या जीवन के अहम फैसले वे बिना किसी पुरूष परामर्श के ले सकती हैं। दरअसल यह सोच उनकी आज की नहीं अपितु पिछली कई सदियों के तिरस्कार व उपेक्षा का परिणाम है। स्त्री  सदा से ही पुरूष की परछाई बनकर जीती आई है। उसके पैरों के निशानों पर ही पैर रखकर उसने जीवन की यात्रा पूरी की है। पुराणों के अनुसार वह विवाह पश्चात पुरूष की अर्धांगिनी  कहलाती है पर क्या वास्तव में वह अधिकार उसे प्राप्त है।
शायद नहीं पहला आधा भाग दूसरे आधे भाग पर हमेशा 
आधिपत्य रखता आया है। स्त्रियां स्वयं भी इस आधिपत्य की आदि रही हैं। परन्तु वर्तमान समय तेजी से बदल रहा है आज यह आधा भाग अपना अधिकार चाहता है।अपना अस्तित्व चाहता है। अपने कौशल को सिद्ध करना चाहता है। जिसका मार्ग शिक्षा और कौशल से होकर गुजरता है।
शिक्षा दो प्रकार की होती है। पहली नैतिक शिक्षा जो शिशु को अपनी माँ-पिता परिवार, समाज  आदि से प्राप्त होती है, दूसरी मौलिक शिक्षा जिसके लिए शिशुओं को विद्यालय भेजा जाता है महाविद्यालय भेजा जाता है विश्वविद्यालय भेजा जाता है आदि। शिक्षा के अभाव में मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास असंभव है।

आज स्त्रियों को पुरुषों से बराबरी नहीं अपितु स्वयं की बेहतरी पर ध्यान देना चाहिए। हम क्यों उलझे है इस प्रश्न में कि क्या पहनना चाहिए क्या नहीं। क्या पोशाक व्यक्ति के कौशल का उचित आकलन है? क्या मन-माफिक कपड़े पहनने से आप सशक्तिकरण की ओर अग्रसर होंगी ये निश्चित है?  यह मामला अत्यंत निजी है, तथा इसका चुनाव भी व्यक्ति का स्वयं के द्वारा ही होना चाहिए। तो क्या हम सिर्फ कपड़े और स्त्रियों के आने जाने के वक्त पर बहस कर उन्हें सशक्त कर सकते हैं? मेरे नजरिए से कहूँ तो नहीं। क्योंकि कौशल कपड़ों से नहीं शिक्षा द्वारा प्राप्त होता है। आपको अगर स्वयं को विशेष सिद्ध करना है तो कौशल का विकास किया जाए न कि पहनावे को पश्चियात किया जाए..। बेशक एक आरामदायक पोशाक आपको आत्मविश्वास देगी परन्तु वह आत्मविश्वास बिना कौशल के उस खाली बन्दूक के सामान है जिसमें कौशल रूपी गोलियां है ही नहीं, क्या कीजिएगा फिर..खाली बंदूक का!
सभी महिलाओं को समझना होगा उनका विकास या महिला सशक्तिकरण का मुख्य उद्देश्य आपको सबल बनाना है। आपको एक आत्मनिर्भर जीवन यापन के लिए समृद्ध करना है न कि महज आपको मनपसंद कपड़े  पहनने का अधिकार देना। आपको उभरना होगा एक सशक्त महिला उद्यमी, राजनेता, फनकार, सामाजिक कार्यकर्ता तथा मार्गदर्शक के रूप में। 
जिससे लिए आपको कौशल की आवश्यकता होगी आत्मविश्वास की आवश्यकता होगी न कि महज पहनने के अधिकार  की। पहनावा तथा ऊपरी सौंदर्य कुछ समय के लिए किसी को प्रभावित कर सकते हैं सदा के लिए नहीं। आपको यह सत्य जानना होगा।
महिला सशक्तिकरण की प्रथम सीढ़ी शिक्षा है। शिक्षा के द्वारा ही आप अपने भविष्य के लिए योजना बना तथा उसका क्रियान्वयन उचित प्रकार कर सकती हैं। शिक्षा ही मनुष्य को उचित -अनुचित में अंतर का ज्ञान कराती है महिलाएं  स्वयं को शिक्षित कर अपने लिए बेहतर भविष्य गढ़ सकती हैं। उसे मनचाहा आकार दे सकती हैं।शिक्षा आपको आत्मनिर्भर बनाती है। आर्थिक व मानसिक रूप से भी सुदृढ़ करती है। 
जब स्त्रियां आर्थिक और मानसिक रूप से सशक्त होंगी तभी वे एक बेहतर भविष्य की नींव रख सकती हैं। अपनी व अपने परिवार की। जैसा कि हम सभी जानते हैं एक स्त्री दो परिवारों से संलग्न होती है। तथा एक शिशु की पहली शिक्षक भी एक माँ होती है। अगर माँ सुशिक्षित तथा आर्थिक, मानसिक, सामाजिक रूप से सम्पन्न है तो उसकी संतान में नैतिक मूल्यों का आना तथा आत्मविश्वास का होना  स्वाभाविक है। एक सशक्त महिला ही एक सशक्त भारत के भविष्य (बच्चे कल का भविष्य) की नींव रख सकती है। यदि नींव मजबूत है तो मकान मजबूत होगा इसमें कोई संयश नहीं है। 

स्त्रियों को स्वयं को आत्मनिर्भर बनाना होगा। *मैं अपनी सारी जिंदगी मेहनत कर जीना चाहती हूँ।ताकि कोई कभी मुझसे यह न कह सके कि 'अगर मैं न होता तो तुम्हारा क्या होता!'*  यह सिर्फ एक कथन नहीं अपितु जीवन मंत्र है। जो आज हर स्त्री को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। 
मेरी कुछ ग्रामीण अशिक्षित सहेलियां हैं।  एक बार मैंने उनसे पूछा कि आप भविष्य में क्या बनना चाहती हैं। भविष्य के विषय में क्या विचार हैं आपके? .. मुझे उनके द्वारा मिला हर एक  जबाव मिलता -जुलता ही लगा। एक अच्छे परिवार में शादी करनी है जिसे उनके परिवारवालों ने उनके लिए चुना होगा।  न ही उनकी स्वयं की कोई विचारधारा है न ही उनके अंदर आत्मविश्वास है। वे सभी बिन मंजिल के राह में चलता हुआ वह भेड़ों का झुंड हैं जिसका मालिक उनको जिस ओर हांक देगा वे सब चल पड़ेगीं। क्या फर्क है इन दिशाहीन स्त्रियों में और उस भेड़ों के झुंड में। जिन्हें मालिक मर्जी से चलाता व मन मर्जी से फायदे के लिए दूध, ऊन निकलता है। जिनका स्वयं का कोई दिमाग नहीं, कोई साध्य नहीं।
क्या सिर्फ विवाह ही स्त्री जीवन का उद्देश्य है? क्या सिर्फ संतान को जन्म देना ही उसका कर्तव्य है? मुझे नहीं लगता। विवाह एक सामाजिक संस्कार है जो हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा भर है यह आपका जीवन उद्देश्य नहीं है। न ही एक उच्च परिवार में विवाह आपकी सफलता का आकलन है।
 इस प्रकार की अल्प या संकुचित मानसिकता स्त्रियों में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखने मिलती है।  सरकार द्वारा आरक्षण व महिला शिक्षा हेतु बनाई गईं विभिन्न योजनाएं महिला सशक्तिकरण के लिए उठाए गए सराहनीय कदम हैं। जो सिर्फ कदम भर बनकर ही रह गए हैं। कहीं न कहीं सरकार द्वारा उचित प्रकार से न किया गया क्रियान्वयन तथा महिलाओं का स्वयं भी इसमें भाग न लेना इन योजनाओं की असफलता का कारण है।
यहाँ इसका एक उदाहरण अवश्य  देना चाहूंगी। ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण महिलाओं के विकास हेतु सरकार ने सरपंची के चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षण दिया है। जिसके द्वारा हर पंच वर्षी में अनेक महिलाएं सरपंच चुनी जाती हैं।  परन्तु उनके सिर्फ नाम चुने जाते हैं वास्तविक संरपच का कार्यभार तो उनके पति संभालते हैं। जिससे उन महिला सरपंचों को भी कोई ऐतराज नहीं होता। क्या वे स्वयं को उस उत्तरदायित्व को संभालने में असमर्थ समझती हैं? क्या उन्हें स्वयं पर विश्वास नहीं होता? इसकी अनेक वजह हो सकती हैं सभी के पास अपने भिन्न-भिन्न कारण होंगे। पर क्या उन सभी कारणों में से कोई भी एक ऐसा कारण होगा जिसका हल निकलना मुमकिन न हो! एक वाक्यांश है :- "करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान।" यह हम सभी ने कभी न कभी जरूर सुना है जिसका अर्थ है अभ्यास करते -करते एक दिन मंदबुद्धि भी बुद्धिमान बन जाता है। मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि आप प्रयास कीजिए बार-बार कीजिए लगातार कीजिए देखिएगा एक दिन आप उस कार्य में अवश्य सफल होंगी। हार न मानना ही जीत की पहली और आखिरी सीख है। स्वयं पर विश्वास कीजिए आप के अंदर पंचायत ही नहीं एक देश को संभालने की भी काबिलियत है जिसका उदाहरण स्व. इंदिरा गाँधी व पूर्व राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी पाटिल दे चुकी है। अपनी एक मुक्त विचारधारा बनाइये और उसपर चलते जाइये मंजिल जरूर मिलेगी। उसके लिए आपको पुरूष से बराबरी करने की आवश्यकता नहीं है बस स्वयं को बेहतर बनाइये।

                  कनक दाँगी

"बृजलता" (लेखक, साहित्यकार) m.p. india

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