28 August

सुवर्णमंदिर से पंचकुला 

suwarnmandir to panchkula
By भागवत तावरे
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मोदी जी, इंदू होती तो ‘डेरा सच्चा...’ न रहता 
  
        यह कोशीश इसलिये नही है की, मुझे भाजपा और काँग्रेस मे कोई तुलनात्मक विश्लेषण करना है, बस आज दो घटनाये आपके सामना रखना चाहता हुँ जिसमे बहुत से पैलू समांतर है। 25 अगस्त को सच्चा डेरा वालो का दंगा जो नरेंद्र मोदीजी के सत्ताचरण के सामने खुलेआम हुवा और दुसरी घटना 8 जून 1984 को घटी जो ‘मिशन ब्ल्यू स्टार’ है जो तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व घटी।
       सिरसा से लेकर पंचकुला तक  धुँवे से लतपत 25 अगस्त की दोपहर, वहा तीन लाख लोगोंने सिर्फ अपनी निष्ठा का प्रदर्शन नही किया बल्की उन्होने हमारे संविधान, न्यायिक एवंम् प्रशासन व्यवस्था की धज्जीयाँ भी उडा दी, उसी भारत की जो महासत्ता होने को बेकरार है। उस भीड को नापना और रोकना हमारे देश के बस कि बात नही थी । लेकीन जरुरी है ये समजना की जिस संकटने देश के सियासी खेमे मे हडकंप मचाया था, क्या वो एक महेज इत्तेफाक था! या फिर कोई साजीश क्योंकी रेडीओे से लेकर टीव्ही के डिब्बे तक, मन और तन की आवाज ताननेवाला 56 इंच का सीना उस दिन शांत क्यो था ? जैसे वह यह कहता हो, मुझे आज कूछ बोलने, करने की इजाजत नही।  और हा शायद मोदीजीने उसदिन यह भी साबित कर दिया की वह मात्र एक कलाकार है जो किसी निर्देशक से संचलीत है। वह निर्देशक कौन है जिसे तारीख 25 की दंगाफिरस्ती कबूल थी। 25 अगस्त के दिन शरीर से निकलती हुई जाने शायद ये भी सवाल करती हुई निकली होगी  क्या आज इंदिरा गांधी होती तो हम इसी तरह खून से लतपत लंबी निंद सोते ?  क्या पता इस सवाल का जवाब वर्तमान सिसकिया दे सके और मधुर भांडारकर सुने ......... 
            अप्रैल 1983 में पंजाब पुलिस के उपमहानिरीक्षक ए.एस. अटवाल को दिन दहाड़े हरिमंदिर साहब परिसर में गोली मार दी गई्। कुछ महीने बाद पंजाब रोडवेज़ की एक बस में घुसे बंदूकधारियों ने जालंधर के पास कई लोगो को मार डाला। इंदिरा गाँधी सरकार ने पंजाब में दरबारा सिंह की काँग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। लेकिन पंजाब की स्थिति बिगड़ती गई्। मार्च 1984 तक हिंसक घटनाओं में 298 लोग मारे जा चुके थे। इंदिरा गाँधी सरकार की अकाली नेताओं के साथ तीन बार बातचीत हुई्।आख़िरी चरण की बातचीत फ़रवरी 1984 में तब टूट गई जब हरियाणा में सिखों के ख़िलाफ़ हिंसा हुई्। 3 जून को भारतीय सेना ने अमृतसर पहुँचकर स्वर्ण मंदिर  को घेर लिया। शाम में शहर में कर्फ़्यू लगा दिया गया। 4  जून को सेना ने गोलीबारी शुरु कर दी ताकि मंदिर में मौजूद मोर्चाबंद चरमपंथियों के हथियारों और असले का अंदाज़ा लगाया जा सके। चरमपंथियों की ओर से इसका इतना तीखा जवाब मिला कि 5  जून को बख़तरबंद गाड़ियों और टैंकों को इस्तेमाल करने का निर्णय किया गया। 5 जून की रात को सेना और सिख लड़ाकों के बीच असली भिड़ंत शुरु हुई्। यही वह वक्त है जो कल की पंचकुला की हत्याओ से समानता रखता है,  और नरेंद्र मोदी को एक कमजोर  पंतप्रधान के रूप मे भी साबित करता है । 
           समय के चक्र ने सच्चा डेरा सौदा का महिम रामरहीम और भिंन्द्रानवाला ( जिसे संत माना गया था )  दोनो एक समान रेखा मे लाया, जिन्होने राष्ट्र की व्यवस्था को ना मानते हुये रक्त का छिडकाव किया । आज ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ को  लगभग  33   साल हो चुके हैं. वह एक सेना का एक ऐसा ऑपरेशन था जिसने देश के सियासी मिजाज को भी बदल कर रखा दिया। इस ऑपरेशन का खामियाजा भारत की ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी जान देकर भुगतना पड़ा. खालिस्तान का सपना देखने वाले सिख समुदाय के लोग आज भी इस ऑपरेशन को भूले नहीं हैं्। सेना की कार्रवाई के वो चार दिन लोगों के रोंगटे खड़े कर देते हैं्। 5 जून 1984 जरनैल सिंह भिंन्द्रानवाला उसका सहयोगी जनरल शाहबेग सिंह और उसके लगभग सभी साथी मारे गए । इसका नतीजा जो निकल आया वो भारतीय राजनीतीकि के नुकसान को प्रदर्शित करता रहेगा।         
         
31 अक्तूबर 1984, नई दिल्ली, सुबह 9 बजे तेज कदमों से चलते हुए इंदिराजी  उस गेट से करीब 11 फीट दूर पहुंच गई थीं जो एक सफदरजंग रोड को एक अकबर रोड से जोड़ता है।  गेट के पास सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह तैनात था। ठीक बगल में बने संतरी बूथ में कॉन्सटेबल सतवंत सिंह अपनी स्टेनगन के साथ मुस्तैद खड़ा था।  आगे बढ़ते हुए इंदिरा गांधी संतरी बूथ के पास पहुंची। बेअंत और सतवंत को हाथ जोड़ते हुए इंदिरा ने खुद कहा-नमस्ते। उन्होंने क्या जवाब दिया ये शायद किसी को नहीं पता लेकिन बेअंत सिंह ने अचानक अपने दाईं तरफ से. 38 बोर की सरकारी रिवॉल्वर निकाली और इंदिरा गांधी पर एक गोली दाग दी। आसपास के लोग भौचक्के रह गए्। सेकेंड के अंतर में बेअंत सिंह ने दो और गोलियां इंदिरा के पेट में उतार दीं्। तीन गोलियों ने इंदिरा गांधी को जमीन पर झुका दिया। उनके मुंह से एक ही बात निकली-ये क्या कर रहे हो। इस बात का भी बेअंत ने क्या जवाब दिया, ये शायद किसी को नहीं पता। लेकिन तभी संतरी बूथ पर खड़े सतवंत की स्टेनगन भी इंदिरा गांधी की तरफ घूम गई्। जमीन पर नीचे गिरती हुई इंदिरा गांधी पर कॉन्सटेबल सतवंत सिंह ने एक के बाद एक गोलियां दागनी शुरु कीं्। लगभग हर सेकेंड के साथ एक गोली। एक मिनट से कम वक्त में सतवंत ने अपनी स्टेन गन की पूरी मैगजीन इंदिरा गांधी पर खाली कर दी। स्टेनगन की तीस गोलियों ने इंदिराजी  के शरीर को भूनकर रख दिया। यह लंबी कहानी इसलिये बताना  जरुरी बन जाता है की देश के हित मे उठाये कदम किसी प्रधानमंत्री को अपने मयत तक ले गये ।  शायद यह मोदीजी के अभ्यास का विषय रहे ।
        आज हरियाणा में न रुकनेवाली  अराजकता का खुला खेल खेला जा रहा है। यदि इस पूरे प्रकरण को ध्यान से देखें तो समज मे आता है 25 अगस्त के बारे मे. केंद्र समेत राज्य सरकार को इंटेलिजेंस से इस संदर्भ  में पर्याप्त जानकारी दी गयी थी। इंटेलिजेंस ने सरकार को बताया था कि बाबा के समर्थन में, तमाम तरह के हथियारों और देसी बमों से लैस लोगों की एक बड़ी संख्या पंचकुला पहुंच चुकी है। साथ ही इंटेलिजेंस ने ये भी कहा था कि, यदि बाबा को सजा होती है तो ये भीड़ उग्र रूप लेकर जान माल के अलावा सरकारी-गैरसरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकती है। इसी चलते आपको बताते चलें कि पंजाब के डीजीपी (कानून व्यवस्था) ने कुछ दिनों पूर्व हरियाणा सरकार को एक पत्र के माध्यम से जानकारी दी थी कि डेरा सच्चा सौदा समर्थकों की एक बड़ी संख्या ड्रमों में ज्वलनशील पदार्थ  और धारधार हथियारों के साथ हरियाणा पहुंच चुकी है। दिलचस्प बात ये है कि न तो हरियाणा सरकार ने और न ही हरियाणा पुलिस ने पंजाब के डीजीपी की बात को गंभीरता से लिया और उसके बाद जो हुआ उसका नतीजा हमारे सामने है। डेरे से ओट बटोरते भाजपेयी 25 तारीख को बाबा और भक्तो की सेवा कर रही थी ?  क्या पंचकुला भारत का हिस्सा नही है ? ये सवाल मेरा नही भारत कि अदालत का है, बेहद चौका देनेवाली बात तो ये है की जब न्यायालय सरकारी-गैरसरकारी संपत्ति को नुकसान डेरा से वसूल करने की बात  कह देती है तो हरियाना के सचिव कहते है नही नुकसान सरकार भरेगी डेरा नही । 
          शायद एक लेखक के रूप मै स्तब्ध हुँ और मुझे आश्चर्य हो रहा की ओ मसिहा जो भाईयो और बहनो कहते हुये अच्छे दिनो कि फुंवार लगाता है, कहा चूप था, क्यो ?  जिस प्रदेश कि इंटरनेट सुविधा बंद हो वहा कि प्रजा को शांती कि आवाहन कर रहे थे , क्या वो तमिळनाडू की जनता को आवाहन कर रहे थे ? नियमित रेडीओ पर आनेवाले सपनो के सौदागर मोदी बाबा उस दिन हरियाना के किसी आकाशवाणी केंद्र पर क्यो नही गये, या फिर जाना नही चाहते , चलिये शायद उन्हे लगा होगा वहा बेअंत सिंग बैठा हो ।   आज वो  ना मन की बात कर रहा है ना कोई लंबा भाषण , आज 40 लोग की मौत पर प्रधान सेवक की आखो मे कोई आसू नही जो गोवा की समंदर के साहील पर नोटो के लिये बहे थे । एक तरफ पाकिस्तान को सर्जिकल स्ट्राईक से हराने की बाते होती है वही चीनी ड्रेगन को निगल ने की भी , लेकीन जिसके अस्तीन मे दाग निकले वो किसे क्या हरायेगा , सवाल तो बनता है । जब की आठ दिन पहले आपको पता हो दंगा कहा होने  वाला हो, कौन करनेवाला है और कब, तब आप हात पर हात रखे शांत क्यो थे , क्या ये सच नही! उस दिन भीड में जो भडवे थे वो भाजप के वोटर थे । मोदीजी पंचकुला को शायद महफुज रख पाते तो क्या उन्हे इंदिराजी कि तरह कोई गोलीयो से थोडी भूनता ? 
कुछ तो ग़लत हो रहा है देश में, जो मासूमों से बलात्कार पर हमारे नेता चुप हैं लेकिन गाय की बात चलते ही आर या पार की बात करने लगते हैं. क्या विकास एक मुखौटा था? 
..

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि सभी  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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